राजयोग
पाराशरी ज्योतिष में राजयोग तब माना जाता है जब किसी केंद्र भाव (1, 4, 7, 10) का स्वामी किसी त्रिकोण भाव (1, 5, 9) के स्वामी से जुड़ता है: युति, परस्पर दृष्टि या राशि परिवर्तन से। परंपरा इसे पद, ज़िम्मेदारी और प्रगति से जोड़ती है। असर ग्रहों के बल और दशा पर निर्भर माना जाता है।
मुख्य तथ्य
| भाव | केंद्र (1, 4, 7, 10) और त्रिकोण (1, 5, 9) |
|---|---|
| मूल शर्त | केंद्रेश और त्रिकोणेश का संबंध |
| संबंध के प्रकार | युति, परस्पर दृष्टि, राशि परिवर्तन |
| पारंपरिक स्रोत | बृहत् पाराशर होरा शास्त्र |
| विशेष | योगकारक ग्रह, जो अकेले केंद्र और त्रिकोण दोनों का स्वामी हो |
| कब फल | परंपरा के अनुसार संबंधित ग्रहों की दशा-अंतर्दशा में |
कैसे पहचानें?
पहले लग्न से भावों के स्वामी लिखें। फिर देखें कि 4, 7 या 10वें भाव का स्वामी 5वें या 9वें भाव के स्वामी के साथ बैठा है, उसे देख रहा है, या दोनों ने राशियाँ बदल रखी हैं। लग्नेश केंद्र और त्रिकोण दोनों का स्वामी माना जाता है। उदाहरण: कर्क लग्न में मंगल 5वें और 10वें भाव का स्वामी होकर अकेले योगकारक बनता है।
बहुत से "राजयोग" क्यों?
ग्रंथों में अलग-अलग नाम वाले कई राजयोग हैं, जैसे धर्म-कर्माधिपति योग (9वें और 10वें भाव के स्वामियों का संबंध)। इसलिए कई कुंडलियों में कोई न कोई राजयोग मिल जाता है। यह शब्द "राजा बनना" का वादा नहीं; इसे क्षमता और अवसर के संकेत की तरह पढ़ा जाता है।
असर किन बातों पर निर्भर?
ग्रह का बल, नीच या अस्त होना, 6, 8, 12वें भाव के स्वामित्व का मेल, और दशा का समय, ये सब देखा जाता है। इसलिए एक ही योग अलग कुंडलियों में अलग पढ़ा जा सकता है।
अपनी कुंडली में देखें
मुफ़्त कुंडली बनाकर ग्रहों के भाव देखें। चंद्रमा का नक्षत्र जानने के लिए 27 नक्षत्र गाइड पढ़ें। सभी योग: कुंडली योग। Pocket Jyotish AI AI शब्दों को समझा सकता है, पर वह इंसान नहीं है और गलती कर सकता है।
अक्सर पूछे गए सवाल
राजयोग कैसे बनता है?
जब केंद्र भाव (1, 4, 7, 10) का स्वामी त्रिकोण भाव (1, 5, 9) के स्वामी से युति, दृष्टि या राशि परिवर्तन से जुड़ता है।
योगकारक ग्रह क्या है?
वह ग्रह जो अकेले एक केंद्र और एक त्रिकोण दोनों का स्वामी हो, जैसे कर्क लग्न में मंगल।
क्या राजयोग से पद या धन पक्का है?
नहीं। परंपरा इसे अवसर का संकेत मानती है; नतीजा बल, दशा और मेहनत पर निर्भर है।